भोपाल में यहां मिलेगा डेढ़ लाख रुपए का कश्मीरी शॉल – News18

विनय अग्निहोत्री/ भोपाल. कश्मीर का नाम आपने आजतक सिर्फ जमीन की जन्नत, ऊंची-हसीन वादियों और कुदरती खूबसूरती के तौर पर सुना होगा लेकिन इन सबके साथ-साथ वहां की “पश्मीना शॉल” भी दुनिया भर में कश्मीरी शॉल के नाम से भी बेहद मशहूर है. पश्मीना शॉल ने दुनिया भर के लोगों का ध्यान आकर्षित किया और यह पूरी दुनिया में सबसे अधिक डिमांड वाले शॉल में से एक बन गई है.

सर्दियों में शॉल का नाम लेते ही जहन में सबसे पहले जो नाम आता है वो है कश्मीरी शॉल. कश्मीरी वूलन पर कलाकारी के कदरदान देश और दुनिया में कम नहीं है. कश्मीर की पश्मीना शाल दिखने में जितनी खूबसूरत होती है उतनी ही गर्म भी होती है. पतली सी शाल ठंड में जादू का काम करती है.

कश्मीरी शॉल की कीमत 1100 रुपए
जम्मू कश्मीर से आए राजधानी भोपाल के ‘भोपाल हाट’ में जावेद लोकल 18 से कहा कि, पश्मीना शॉल दुनियां भर में अपनी बनावटी के कारण फेमस है. इसकी कीमत करीब डेढ़ लाख रुपए के आसपास होती है और भी कश्मीरी शॉल है जिनकी कीमत 1100 रुपये से शुरू हो जाती है. जावेद ने आगे कहा  कि, एक पश्मीना शॉल की कीमत पंद्रह सौ रुपए से शुरू हो कर डेढ़ लाख रुपये तक होती है. ये शॉल याक के बालों से बनी हुई होती है तो उसकी कीमत काफी ज्यादा हो जाती है.इसे बनाने के लिए चेगू और चंगतांगी बकरी की नस्लों से मिलने वाली ऊन का इस्तेमाल किया जाता है. यह बकरी पहाड़ों की ज्यादा ऊंचाई पर मिलती है जहां आबोहवा बहुत ही मुश्किल होती है. एक बार में एक बकरी से बहुत कम ऊन ही मिल पाती है.

डेढ़ लाख रुपए की सॉल बनने में 3 महीनों का वक्त
चेंगू नस्ल की बकरी से लगभग हर साल 100 ग्राम और च्यांगरी नस्ल की बकरी से 250 ग्राम पश्मीना ऊन मिलती है. इसके साथ ही इसे बनाने के लिए याक के बालों का भी इस्तेमाल किया जाता है. एक शॉल बनाने में लगभग 3 महीनों का वक्त और 3 बकरियों की ऊन लगती है. रोजानाकारीगर इस शॉल को बनाते है और इसी दौरान शॉल का रंग भी तय किया जाता है, इसलिए इसका इतना महंगा होना लाज़मी है.

कैसे पड़ा पश्मीना नाम ?
पश्मीना शब्द फारसी के ‘पश्म’ शब्द से बना है, जिसका मतलब होता है ऊन. पश्म का मतलब चरणबद्ध तरीके से ऊन की बुनाई भी बताया गया है. पश्मीना ऊन, कश्मीर की एक खास प्रजाति की पहाड़ी बकरी से निकाला जाता है, जिसे च्यांगरा या च्यांगरी कहते हैं. इन बकरियों की खासियत यह है कि ये हिमालय के पहाड़ों में 12000 फीट की ऊंचाई और माइनस 40 डिग्री से ज्यादा तापमान में रहती हैं. खासकर, कश्मीर, लद्दाख, नेपाल, तिब्बत के पहाड़ी इलाकों में पाई जाती हैं. कश्मीर में इन बकरियों को जो खानाबदोश पालते हैं, उन्हें चांगपा कहते हैं.

नेपोलियन ने अपनी महारानी को शाल किया था गिफ्ट
ईसा पूर्व तीसरी सदी अैर इसा बाद 11वीं सदी के एतिहासिक दस्तावेजों में शाल बुनाई का जिक्र मिलता है. कश्मीरी पश्मीना शाल की लोकप्रियता और गुणवत्ता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि नेपोलियन बोनापार्ट ने भी अपनी महारानी को इसे उपहार में दिया था. स्वतंत्रता पूर्व ब्रिटेन की महारानी को भी कश्मीरी पश्मीना शाल भेंट किए जाते रहे हैं. अपनी गर्मजोशी, हल्के वजन और विशेषता बूटा डिजाइन के कारण आज यह शॉल दुनिया भर में फेमस है.

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Source : hindi.news18.com