चीन की दीवार की रक्षा कैसे करता है 'जीवित पदार्थ', शोध ने खोला राज – News18

हाइलाइट्स

चीन की दीवार सात ऐतिहासिक अजूबों में से मानी जाती है.
इस दीवार के सैकड़ों किलोमीटर के हिस्से आज भी पूरी तरह से संरक्षित है.
दीवारों पर जमी जीवितपदार्थों की परत ने इसे नुकसान की जगह रक्षा ज्यादा प्रदान की है.

दुनिया के सात ऐतिहासिक अजूबों में चीन की दीवार अपनी विशालता के लिए बहुत मशहूर है. सैकड़ों सालों से यह लंबी दीवार या दीवारों को समूह मजबूती से टिका हुआ है और यह वैज्ञानिकों  के लिए पड़ताल का मुद्दा रहा है कि आखिर इतने सालों के बाद भी यह दीवार खत्म क्यों नहीं हो गई है. करीब 2200 किलोमीटर तक फैली यह दीवार आज तक इतनी संरक्षित तो रही है, लेकिन इसके संरक्षण के भी प्रयास किए जा रहे हैं. साइंस एडवांस में प्रकाशित शोध में शोधकर्ताओं ने इस दीवार के संरक्षण में उस पर जमे जिवित पदार्थों के फायदे और जोखिम को लेकर चल रही बहस खत्म करते हुए एक रहस्य को उजागर किया है.

जीवित पदार्थों की परत
चीन अमेरिका और स्पेन के शोधकर्ताओं द्वारा किए गए अध्ययन में बायोक्रस्ट की चीन की दीवार के संरक्षण या नुकसान में भूमिका की पड़ताल की. बायोक्रस्ट वे जैविक पदार्थ हैं जो दीवार की परत पर की मिलीमीटर से कई सेंटीमीटर की गहराई तक जम जाते हैं. इनमें बैक्टीरिया, काई, फफूंद,  और अन्य छोटे पौधे शामिल होते हैं जो किसी भी सतह पर ऊग आते हैं.

नुकसानदेह होते हैं जीवित पदार्थ?
कुछ लोगों को लगता है कि भौतिक और रासायनिक प्रक्रियाएं मिलकर सतह के नीचे की संरचना को एक तरह के अपक्षय से पीड़ित कर देती हैं और इसलिए उन्हें चीन की विशाल दीवार जैसी संरचनाओं के संरक्षण के लिए हटा देना चाहिए. वहीं कई लोगों का मानना है कि जीवित पदार्थों की यह परत एक तरह से दीवार के संरक्षण का काम कर रही है.

600 किलोमीटर लंबे हिस्से का अध्ययन
इस धारणा को मानने वालों का कहना है कि बायोक्रस्ट सतह की मिट्टी को हवा और बारिश बचाने में एक बड़ी भूमिका निभाती है और एक तरह से उसके लिए कवच का काम करती है, जिस तरह से वे प्राकृतिक सतह की रक्षा करते हैं. इसी की सच्चाई जानने के लिए शोधकर्ताओं की टीम ने चीन की विशाल दीवार के करीब 600 किलोमीटर लंबे हिस्से का गहन अवलोकन किया जिसमें सूखी जलवायु वाले हिस्से पर ज्यादा गौर किया गया.

अलग अलग पदार्थों का उपयोग
कई हिस्सों में यह कहें कि बहुत सारी दीवारों से मिल कर बनी इस संरचना के बारे में बताया जाता है कि यह चीन के उत्तरी सीमा के इलाके में सातवीं ईसा पूर्व से बनना शुरू हुई थी. इसके बहुत सारे हिस्से टेढ़े मेढ़े और ऊंचे नीचे पहाड़ों पर रेंगते हुए पत्थर की तरह दिखाई देते हैं. इसके बहुत सारे पुराने हिस्से चिकनी मिट्टी से समृद्ध हैं जो लकड़ी के फ्रेम के बीच  चट्टान की तरह ठोस होने तक लगाए गए थे.

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खराब भी हुए हैं कई हिस्से
वहीं गोबी रेगिस्तान जैसे और ज्यादा सूखे इलाकों में रेत, कंकड़, छोटी झाड़ियों की शाखाएं का भी इन दीवारों में मसाले में इस्तेमाल किया गया था. इसी दीवार के कई हिस्सों पर समय की वैसी मार नहीं पड़ी  जैसी की अमूमन हर तरह की दीवार पर पड़ती है. जबकि समय के साथ कई हिस्सों की नीव तक पर बारिश और हवा का प्रभाव पड़ा है और वे खराब होते चले गए.

क्या हुआ फायदा
शोधकर्ताओं ने पाया कि दीवार के बचे हुए हिस्सों के दो तिहाई भाग बायोक्रस्ट की परतें चढ़ी हुई हैं जिनमें साइनोबैक्टीरिया और काई के प्रजातियों की कॉलोनी तक यहां वहां बिखरी हुई देखने को मिलीं. देखा गया कि जहां जहां काई और पौधे आदि हैं वहां दीवार की सतह के नीचे के भाग कम छेद वाले थे और आसानी से गिरने या बिखरने वाले नहीं थे.

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जहां आमतौर पर माना जाता है कि काई और छोटे पौधे दीवारों को नुकसान पहुंचाते हैं. शोधकर्ताओं ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि चीन की दीवार के मामले में ये आम तौर पर मौसम की वजह से होने वाले अपक्षय की तुलना में कम नुकसानदेह साबित हुए, बल्कि उससे उनकी रक्षा तक करते हुए पाए गए. यह सच है कि पर्यटकों के लिए इस तरह की काई आदि की परतें चीन की दीवार की अच्छी छवि नहीं बनातीं, फिर भी संरक्षण के महत्व को भी नकारा नहीं जा सकता.

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Source : hindi.news18.com