गरीबी को मात देकर इस महिला ने शुरू किया खुद का बिजनेस, अब लाखों में इनकम – News18

दीपक कुमार/ बांका. इंसान के लिए गरीबों का दंश सबसे अधिक कष्टदायक होता है और उबरना भी कठिन हो जाता है. लेकिन, इस विपरीत परिस्थिति में जो संयम से काम लेते हैं, वे अपना रास्ता निकाल हीं लेते हैं. कुछ ऐसी हीं कहानी बांका जिला मुख्यालय से सटे समुखिया की रहने वाली सोनवर्षा कुशवाहा की. गरीबी की मार झेल रही सोनवर्षा कुशवाहा के लिए राह आसान नहीं था. पति घर से बाहर रहकर ड्राइवरी करते थे, ज्यादा कमाई भी नहीं हो पाती थी.

इसी को देखते हुए सोनवर्षा ने पाई-पाई जोड़कर सिलाई का काम सीखा और एक सिलाई मशीन खरीद ली. इसके बाद जब हाथ में कुछ पैसे आने लगे तो उसे सहेजना शुरू किया. कुछ दिन तक ऐसे हीं चलता रहा. जब कुछ पूंजी जमा हो गई तो दो बकरियां खरीद ली. धीरे-धीरे आर्थिक स्थिति मजबूत होती गई और आज 50 बकरियां पाल रही है. इसके अलावा गो-पालन भी शुरू किया है और दूध से भी आमदनी प्राप्त कर रही है.

चार नस्ल की बकरियों को पालती है सोनवर्षा
सोनवर्षा कुशवाहा ने बताया कि पति ड्राइवरी का काम करते हैं और अक्सर घर से बाहर हीं रहते थे. उन्होंने बताया कि किसी तरह सिलाई मशीन खरीदा और आस-पड़ोस के महिलाओं के कपड़े सिलने लगी. इससे आमदनी हो जाती थी, लेकिन बचत नहीं हो पाता था. उन्होंने बताया कि गांव-घर में एक कहावत है कि आर्थिक स्थिति खराब हो तो बकरी पालन करो और आर्थिक स्थिति खराब करनी हो तो गाड़ी खरीद लो. बकरी पालन वाली कहावत को अमल में लाते हुए दो बकरी खरीद लिया.

जिसमें एक बकरी की कीमत 1500 रूपए थी. उन्होंने बताया कि दो बकरी से शुरू किया गया यह धंधा अब 50 बकरियों तक पहुंच गया है. सोनवर्षा कुशवाहा ने बताया कि फिलहाल चार नस्ल की बकरियां पाल रहे हैं. जिसमें तोतापरी, सिरोही, बीटल, ब्लैक बंगाल की बकरियां शामिल है. इसके बाद आर्थिक स्थिति में और सुधार हुआ तो गाय भी पालने लगे हैं. सभी से अच्छी कमाई हो रही है.

बरसात का मौसम बकरियों के लिए होता है खतरनाक
सोनवर्षा कुशवाहा ने बताया कि बकरी सामान्य तौर पर देसी बकरी इस वातावरण के अनुकूल है, जिसे उतनी देखरेख की जरूरत नहीं होती है. लेकिन, अन्य नस्ल की बकरियों का ख्याल रखना पड़ता है. तोतापरी, बीटल और सिरोही नस्ल की बकरियों को समय पर भोजन देने के साथ मौसम में होने वाले बदलाव के दौरान चौकस रहना पड़ता है. अधिक ठंड में चौकी की व्यवस्था कर गर्माहट के लिए हीटर लगाना पड़ता है.

वहीं गर्मियों में पंखे भी लगाना पड़ता है. सबसे खतरनाक बरसात का मौसम होता है. इस दौरान बकरियों में सर्दी की संभावना बढ़ जाती है. इससे बचाने के लिए नाक में सरसों तेल के साथ दवाई भी देते हैं. बकरी पालन के लिए 2014 में यूको आरसेटी से प्रशिक्षण भी लिया है. तोतापरी जैसे नस्ल के बकरे दो से ढाई लाख रुपए में बिकता है. वहीं देसी नस्ल के बकरे का डिमांड अधिक है. इसका मीट 600 से लेकर 650 रूपए किलो तक बिकता है.

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Source : hindi.news18.com