भोलेनाथ को खुश करने होली पर अजब परंपरा, युवा भी करते हैं ये काम – News18

रिपोर्ट- सावन कुमार
बक्सर. रंगों का त्योहार अपने में उल्लास और परंपरा समेटे हुए है. हर शहर और प्रदेश की अपनी परंपराएं हैं. बिहार के भी अपने तौर तरीके हैं. यहां के एक गांव में होली पर लोग नये कपड़े पहनते हैं और मांस नहीं खाते. इसके पीछे उनकी सीधी सोच है कि अपनी खुशी के लिए वो किसी दूसरे की जान नहीं ले सकते.

बिहार के जो प्रवासी हैं वो दो मौकों पर ही अपने गांव आते हैं. एक छठ और दूसरा होली. होली में लजीज व्यंजन के खान-पान का अपना अलग मजा है. अधिकतर लोग इस दिन मांस-मदिरा खाना-पीना पसंद करते हैं. बिहार में होली के दिन खुद खाने से ज्यादा लोगों को खिलाने में सुकून मिलता है. आज हम आपको बिहार के एक ऐसे गांव के बारे में बताने जा रहे हैं, जहां होली के दौरान नॉनवेज खाना या पकाना पूरी तरह से वर्जित है. इस गांव का नाम सोवां है और जिला बक्सर है.

एकता में ही शक्ति
बक्सर जिला मुख्यालय से कुछ ही दूरी पर सोवां गांव है. यहां कई पीढ़ियों से होली के दिन नॉनवेज नहीं खाने की परंपरा चली आ रही है. इस गांव के लोग होली के दिन पुआ- पकवान बनाते हैं. यहां विशेष तौर पर दही बड़ा बनाया जाता है. स्थानीय निवासी अभिषेक ने बताया यह गांव को एकता के सूत्र में बांधे रखने का भी प्रतीक है. यहां हर समुदाय के लोग रहते हैं, लेकिन जब बात गांव की परम्परा की आत आती है तो सभी इसका एक साथ मिलकर पालन करते हैं. गांव का कोई भी व्यक्ति किसी से जाकर ये नहीं कहता है कि आप ऐसा करो और ऐसा ना करो .सभी लोग खुद से इस नियम अपना कर्तव्य मानते हैं.

अपनी खुशी के लिए दूसरे की जान मत लो
इसी गांव के सौरभ कुमार कहते हैं- इस परम्परा से काफी खुश हैं. घर पर बचपन से यही संस्कार मिला है. अपनी ख़ुशी के लिए किसी को नुकसान नहीं पहुंचाना चाहिए. अपना त्योहार किसी जानवर की जान लेकर मनाना कतई उचित नहीं है. गांव की ये परम्परा हर दूसरे जीव का सम्मान करना भी सिखाती है.

होली पर नयी पोशाक
स्थानीय गोलू कुमार ने बताया होली पर नये कपड़े पहनने की भी परंपरा है. लोग नयी पोशाक पहनकर भूअरनाथ शिव मंदिर जाते हैं और शिव जी को अबीर-गुलाल चढ़ाते हैं. गांव के बड़े-बुजुर्ग देर तक उस मंदिर में बैठे रहते हैं. मंदिर आने-जाने वाले लोग गांव के उन बुजुर्गों से आशीर्वाद लेते हैं. गांव की महिलाएं जो भी पकवान बनाती हैं, वो सबसे पहले बाबा भूअरनाथ को अर्पित करती हैं और उसे प्रसाद रूप में ग्रहण करती हैं. 70 वर्षीय अरुण महतो ने बताया कि उनका बचपन भी इसी परम्परा के साथ गुजरा है. अपने दिनों को याद करते हुए उन्होंने बताया पहले इस गांव की रौनक आज से सौ गुना ज्यादा थी. गांव में एक महीना पहले से ही होली का उमंग दिखने लगता था. जगह-जगह पर फगुआ गाया जाता था. फगुवा तो अब भी गाया जाता है लेकिन पहले जैसी रौनक नहीं है. इस बात की खुशी जरूर है कि युवा अपनी परंपरा से जुड़े हुए हैं.

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Source : hindi.news18.com