क्यों आज अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा शिमला का गंज बाजार, जानिए क्या है कारण – News18

पंकज सिंगटा/शिमलाः शिमला का गंज बाजार आज अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है. 120 साल पुराना बाज़ार धीरे धीरे अपने वर्चस्व को खो रहा है. शिमला की अनाज मंडी के रूप में जाना जाने वाला बाज़ार आज चंद ग्राहकों का मोहताज बन चुका है. अस्तित्व खोने का कारण कहीं न कहीं बढ़ती हुई आधुनिकता और स्थानीय स्तर पर वस्तुओं का आसानी से मुहैया होना है. इस बाजार को ब्रिटिश काल के दौरान बसाया गया था और ब्रिटिश अधिकारी एडवर्ड गंज के नाम से यहां का नाम गंज बाजार रखा गया था. करीब 120 साल पहले बसाए गए इस शहर में शुरुआती दिनों में अनाज बेचा जाता था, इस लिए इसे अनाज मंडी के नाम से जाना जाने लगा.

गंज बाज़ार के व्यापारियों ने बताया कि बाज़ार को बसाने के शुरुआती दौर में यहां अनाज बेचा जाता था, इसके साथ ही हिमाचल प्रदेश के लगभग हर हिस्से से यहां पर विभिन्न उत्पाद भी बिकने के लिए आया करते थे. वर्ष 2000 आते आते खाद्य वस्तुएं और अन्य उत्पाद स्थानीय स्तर पर उपलब्ध होने लगे, इस कारण लोगों ने अनाज मंडी से हट कर दूसरी दुकानों से समान खरीदना शुरू कर दिया, जिस कारण गंज बाजार में लोगों की आमद में गिरावट आने लगी. इसके बाद व्यापारियों ने मार्केट में मसाले बेचना शुरू किया और आज कई लोग इसे मसाला मार्केट के नाम से भी जानते है. यही कारण है कि पूरी मार्केट से मसाले की महक आती है.

आधुनिकरण ने तोडी व्यापारियों की कमर
गंज बाज़ार की मसाला मार्केट यूं तो मशहूर है, लेकिन जब से बाजारों में मशीन से पिसे हुए मसाले आने शुरू हुए तो इसके बाद मसाला मार्केट में लोगों का काम एक बार फिर मंदा होना शुरू हो गया. इसका परिमाण यह हुआ कि लोगों को पहले अपने परंपरागत अनाज के व्यापार को बंद करना पड़ा और उसके बाद मसाले के व्यापार को छोड़ कर करियाना की दुकानों का रुख करना पड़ा.

हालांकि यहां आज भी मसाले बेचे जाते है लेकिन यह आंकड़ा अब बहुत कम है. कुछ साल पहले ही यहां पर दुकानदारों ने मल्टीग्रेन आटा रखना शुरू किया. इसके अलावा दालों को पीसकर बेसन बनाना और गेहूं को पीसकर आटा बनाने वाली मशीनों को भी दुकान में रखना शुरू किया गया. कड़ी मशकत के बाद यह बाजार अपनी ऐतिहासिक महत्ता को बचाए हुए है.

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Source : hindi.news18.com