न्याय के देवता रूप में विश्व प्रसिद्ध हैं कुमाऊं के गोलू देवता, अंग्रेज भी… – News18

तनुज पाण्डे/ नैनीताल. उत्तराखंड को देवभूमि के नाम से जाना जाता है. यहां के कण-कण में देवों का वास है. आज हम आपको कुमाऊं के एक ऐसे देवता के बारे में बताने जा रहे हैं, जिनको न्याय के देवता के रूप में जाना जाता है. मान्यता है कि गोलू देवता के दरबार में त्वरित न्याय प्राप्त होता है और मनोकामना की पूर्ति होती है. लोग स्टांप पेपर, चिट्ठी आदि के माध्यम से अपनी मनोकामना या परेशानी गोलू देवता के मंदिर में लिखकर अर्जी लगाते हैं और मनोकामना की पूर्ति हो जाने पर मंदिर में घंटी व प्रसाद चढ़ाते हैं. यह प्रथा कई सदियों से चली आ रही है और गोलू देवता के घोड़ाखाल, चितई और अन्य मंदिरों में लटकी करोड़ों घंटियां इस बात की गवाह भी हैं. गोलू देवता के घोड़ाखाल मंदिर में कई हस्तियों समेत अंग्रेज अधिकारियों ने भी घंटियां अर्पित की हैं. कुमाऊं मंडल में गोलू देवता को कुल देवता के रूप में पूजा जाता है. गोलू देवता को पहाड़ में गोल्ज्यू, दूधाधारी आदि नामों से पुकारा जाता है.

नैनीताल निवासी प्रसिद्ध इतिहासकार प्रोफेसर अजय रावत Local 18 को बताते हैं कि गोल्ज्यू का जन्म चंद वंश के राजा हलराई के घर में हुआ था, जिनका राज्य वर्तमान पिथौरागढ़ जिले के अंतर्गत धूमा गढ़ में था. हलराई राजा की सात पत्नियां थीं और उनकी एक भी संतान नहीं थी. राजा हलराई की आठवीं पत्नी पंचनाम देवताओं की बहिन कलिंगा (काली) से थी, जिनसे उन्हें वरदान स्वरूप पुत्र की प्राप्ति हुई. लेकिन प्रसव के समय कलिंगा रानी बेहोश थीं और उनकी सात सौतनों ने ईर्ष्या के कारण कलिंगा रानी की आंखों में पट्टी बांधकर बच्चे को लकड़ी के बक्से में रखकर काली गंगा में बहा दिया और कलिंगा रानी को बताया कि उन्होंने सिल बट्टे (पत्थर) को जन्म दिया है. आगे चलकर ये बक्सा एक मछुआरे के जाल में फंस गया. मछुआरा निसंतान था और जैसे ही उसने बक्सा खोला, तो बक्से के अंदर से बालक मिला जिसे देख मछुआरा बेहद खुश हुआ और उस बालक का नाम गोरिया या गोलू रख दिया.

जब काठ के घोड़े को पिलाया पानी

उन्होंने कहा कि गोलू देवता या गोरिया बालक को लकड़ी का बना काठ का घोड़ा बेहद पसंद था. वह बाल्यावस्था में काठ के घोड़े से खेलते थे. एक बार जब गोरिया बालक काठ के घोड़े को पानी पिलाने लगे, तो वहां मौजूद राजा की सात रानियां हंसने लगीं और उनका मजाक उड़ाने लगीं. तब गोरिया बालक ने रानियों से कहा कि जिस प्रकार एक महिला सिल बट्टे को जन्म दे सकती है, तो काठ का घोड़ा भी पानी पी सकता है. जैसे ही यह बात राजा तक पहुंची, तो सारा भेद खुल गया और राजा द्वारा रानियों को मृत्युदंड की सजा सुनाई गई, लेकिन गोरिया बालक को रानियों पर दया आ गई और उनके दंड को माफ कर दिया गया.

गोल्ज्यू थे वीर योद्धा

प्रोफेसर रावत बताते हैं कि हमारे पहाड़ में कई वीर योद्धा हुए हैं. महाभारत के युद्ध में भी पहाड़ के कई सैनिक शामिल थे. उत्तराखंड में कोई भी सैनिक यदि युद्ध भूमि में शहीद होता है, तो उन्हें देव तुल्य माना जाता है. गोलज्यू भी वीर योद्धा थे और चंद राजाओं के सेनानायक थे. कई मौखिक किवदंतियों के अनुसार, गोलज्यू ने तिब्बत के साथ युद्ध में अपने प्राण न्यौछावर कर दिए थे और उन्हें तभी देव तुल्य माना गया. पहाड़ में ही नहीं भारत की विभिन्न जगहों में गोलज्यू अलग अलग नामों से देवता के रूप में पूजे जाते हैं. प्रोफेसर रावत ने आगे बताया कि गोलू देवता को सफेद घोड़ा बेहद पसंद था और वह घुड़सवारी के शौकीन थे. गोल्ज्यू घोड़े पर बैठकर जगह जगह रुक कर न्याय का दरबार लगाते थे और जिन लोगों को कोई परेशानी होती थी या न्याय नहीं मिलता था, तो गोलज्यू उनको अपने दरबार में त्वरित न्याय प्रदान करते थे.

आज भी यहां मिलता है न्याय

गोल्ज्यू की इन जगहों में गोलू देवता के धाम स्थित हैं, जहां आज भी लोगों को त्वरित न्याय प्राप्त होता है. इनमें घोड़ाखाल मंदिर नैनीताल में स्थित है और चितई गोलज्यू मंदिर अल्मोड़ा में है. गोल्ज्यू का मंदिर चंपावत में भी है. 16वीं शताब्दी में चंद राजाओं ने अपनी राजधानी चंपावत से अल्मोड़ा स्थानांतरित की और चितई में गोलू देवता मंदिर की स्थापना की. बाद में चंद राजाओं का नैनीताल समेत तराई भाबर के इलाकों में आगमन हुआ और वहां पर गोलज्यू के मंदिर स्थापित हुए.

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Source : hindi.news18.com