दैत्यों का वध करने के लिए यहां देवी ने लिया था अवतार, आज भी मौजूद हैं पदचिन्ह – News18

कमल पिमोली/श्रीनगर गढ़वाल. जब स्वर्ग की अमरावती पर और इंद्र के सिंहासन पर दैत्यों ने आक्रमण कर लिया था. देवता कंदराओं में, गुफाओं में भागने के लिए विवश हो गये थे. हर जगह त्राहिमाम मचा हुआ था. तब सभी देवता त्रिदेवों (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) की शरण में गए. वहां से भी कोई समाधान नहीं मिला. तो दैत्यों से मुक्ति पाने के लिए देवताओं ने ध्यान लगाया, तो पता चला कि इनका वध किसी स्त्री के हाथ से होगा. जिसके बाद एक शक्तिपुंज कालीशिला नामक स्थान पर प्रकट हुआ, जिससे देवी ने अवतार लिया व महिषासुर दैत्यों का वध किया. आज भी यह स्थान एक शक्तिपीठ के रूप श्रद्धालुओं की आस्था का केन्द्र है.

कालीशिला मंदिर उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले में स्थित है. यह समुद्र तल से 3,463 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है. यहां साल भर श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है. विशेष रूप से चारधाम यात्रा के दौरान यहां भी बड़ी संख्या में श्रद्वालु पहुंचते हैं. कहा जाता है कि यहां आकर साधना करने से ज्ञान की प्राप्ति होती है. इसलिए यहां साल भर भक्तों का तांता लगा रहता है.

यहां से होते हैं तीन केदार के दर्शन

केदारनाथ मंदिर के वेदपाठी स्वयंवर सेमवाल बताते हैं कि कालीशिला मंदिर क्षेत्र से पंच केदारों में से तीन केदार के दर्शन भी साक्षात होते हैं. यहां से बाबा केदारनाथ, मदमहेश्वर, तुंगनाथ के साथ ही चंद्रशिला चोटी के भी दर्शन होते हैं. इस दैवीय क्षेत्र के प्रति स्थानीय लोगों की अटूट आस्था है. वहीं कई नामी लोग भी यहां पहुंच साधना कर चुके हैं, लेकिन आलम यह है कि आज भी कालीशिला क्षेत्र मूलभूत सुविधाओं से जूझ रहा है. बिजली, शौचालय से लेकर रहने तक की यहां कोई उचित व्यवस्था नहीं की गई है. जिससे श्रद्वालुओं को खासी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है.

यहां मौजूद है देवी काली के पदचिन्ह


स्कन्द पुराण के केदारखंड में भी कालीशिला मंदिर का वर्णन किया गया है. केदारखंड के 62 वें अध्याय में मां काली के मंदिर का वर्णन है. रूद्रप्रयाग जिले के उखीमठ क्षेत्र में स्थित कालीमठ मंदिर से लगभग 8 किलोमीटर की खड़ी चढ़ाई चढ़ने के बाद इस दिव्य शिला के दर्शन होते है, जिसे कालीशिला के नाम से जाना जाता है. इस शिला में आज भी देवी काली के पैरों के निशान मौजूद हैं.


आज भी 64 योगिनियां करती है विचरण

मान्यता है कि शुंभ, निशुंभ और रक्तबीज के वध के लिए देवी ने कालीशीला में 12 साल की बालिका का रूप धारण किया था. कालीशिला में देवी के 64 यन्त्र हैं, इन्हीं यंत्रों से मां दुर्गा को शक्ति मिली थी. कहा जाता है कि दैत्यों का वध करने के बाद काली मां इसी जगह पर अंतर्ध्यान हो गई थी. आज भी यहां पर रक्त शिला, मातंगशिला व चंद्रशिला स्थित है. मान्यता यह भी है कि इस जगह पर आज भी 64 योगिनियां विचरण करती रहती हैं. धर्म के जानकारों का भी मानना है उत्तराखंड का ये वो शक्तिपीठ है, जिसकी तुलना किसी से नहीं की जा सकती.


ऐसे पहुंचे कालीशिला

अगर आप कालीशिला मंदिर पहुंचना चाहते हैं, तो इसके लिए तीन रास्ते हैं. ब्यूंखी, जग्गी और राऊलैंक से तीन पैदल मार्ग हैं कालीशिला तक पहुंचते हैं. कालीमठ तक वाहन से पहुंचा जा सकता है. इससे आगे का रास्ता पैदल ही तय करना होता है.

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Source : hindi.news18.com