हांफने लगे नल तो याद आए नौले धारे…पहाड़ के ये धरोहर जिंदा हो जाएं तो खत्म… – News18

हिमांशु जोशी/पिथौरागढ़. उत्तराखंड के पर्वतीय इलाकों में सदियों से लोग पीने के पानी के लिए नौले का उपयोग करते आये हैं. नौले पहाड़ों में भूमिगत जल स्रोतों के संरक्षण की एक बहुत पुरानी परंपरा है, जिसे विशेष आकार और तकनीक से बनाया जाता था. पहाड़ी सभ्यता के लोग इन नौले में एकत्रित शुद्ध जल को पीने के पानी के रूप में उपयोग करते थे, जिस पर पूरे गांव की आबादी निर्भर रहती थी.

नौले धारे ही पानी के मुख्य स्रोत हुआ करते थे
हर गांव का अपना एक नौला होता है, जिसके संरक्षण का जिम्मा भी गांव के लोगों पर ही रहता था. पहाड़ों पर नौले और धारे ही पीने के पानी के मुख्य साधन हुआ करते थे, आज भी ग्रामीण क्षेत्रों के लोग पीने के पानी के लिए इन नौलों पर ही निर्भर हैं. लेकिन लगातार बढ़ते तापमान और बारिश की कमी के कारण यह भूमिगत जल स्रोत रिचार्ज नहीं हो पा रहे हैं.

शहर के ज्यादातर नौले हुए प्रदूषित
पिथौरागढ़ शहर के नौलों की बात करें, तो यहां मानवीय दखल के कारण सभी नौले प्रदूषित हो चुके हैं. इस पर चिंता जताते हुए पर्यावरण कार्यकर्ता यशवंत सिंह ने कहा कि मानवीय दखल और बारिश के न होने से नौले के अस्तित्व को खतरा है.

उत्तराखंड की संस्कृति का विशेष हिस्सा है नौले
उत्तराखंड में इन नौलों धारों का ऐतिहासिक व सांस्कृतिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्व है. यहां पर पहाड़ी इलाकों में कई नौले अत्यंत प्राचीन हैं.उत्तराखंड में विवाह और अन्य विशेष अवसरों पर नौलों धारों में जल पूजन की भी सांस्कृतिक परंपरा है, जो एक तरह से मानव जीवन में जल के महत्व को इंगित करता है. अब जरूरत है, इस पुराने परंपरा को जीवंत बनाए रखने के लिए इसका संरक्षण करने का. ऐसा करने से न सिर्फ पार्यावरण बचेगा. बल्कि पुरानी हिमलायी परंपरा भी जीवित रहेगी.

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Source : hindi.news18.com